5 दिन पहले कोतवाली पुलिस आधी रात 3 युवकों को बेहोशी की हालत में एमजी अस्पताल लेकर आई। युवकों ने मीडिया के सामने पुलिस ज्यादतियों से त्रस्त होकर खुदकुशी का प्रयास करने के खुलासे किए। इससे हड़कंप मचा तो पुलिस ने आरोपों को सिरे से नकार दिया, लेकिन पुलिस के युवकों के अस्पताल लाने का तरीका और ज्यादा चौंकाने वाला और दुखद है।

सामने आई मानवता को शर्मसार कर देने वाली हरकतें 

भास्कर ने एमजी अस्पताल प्रशासन के सहयोग से सीसीटीवी फुटेज खंगाले तो उस रात पुलिस की अस्पताल में मानवता को शर्मसार कर देने वाली हरकतें सामने आई हैं। जी हां। हमारा उद्देश्य पुलिस की छवि को धूमिल करना नहीं है, लेकिन तस्वीरें वाकई बेहद दुखद और पुलिस की युवकों के प्रति अमानवीयता को दिखाती है। ये तस्वीरें साफ बयां कर रही है कि कानून के रखवालों ने किस कदर उस रात कानून तोड़ा, इतना ही नहीं पुलिस के उस दावे की भी पोल खुल चुकी है, जिसमें तीनों युवकों को उसी रात 12:30 बजे जयपुर रोड पर पकड़ने का दावा किया गया है।

वहीं इन वीडियो के सामने आने के बाद युवकों के पुलिस के खिलाफ किए दावों की गंभीरता और भी बढ़ गई है। फुटेज में साफ नजर आ रहा है कि पुलिस पहले एक युवक को बाइक पर बैठाकर अस्पताल लेकर आती है। बाइक सीधे अस्पताल के हॉल से होकर ट्रोमा वार्ड में ले जाती है। इसके बाद दूसरे युवक को अर्धनग्न (अंडरवियर में) हाल में दो पुलिसकर्मी दौड़ाकर वार्ड में ले जाते हैं।

थोड़ी ही देर में तीसरे युवक को दो कांस्टेबल दोनों पैर और हाथ पकड़ बेरहमी से उठाकर भीतर ले जाते हैं। ये सब सरेआम होता है और वहां मौजूद मरीज और उनके परिजनों के सामने।

इस दौरान वहां सुरक्षाकर्मी और परिजन भी पुलिस की इन हरकतों को देख स्तब्ध रह जाते हैं, लेकिन पूरा पुलिस जाब्ता देख वह खामोश हो गए। इन तस्वीरों को देख एक नजरिया यह भी हो सकता है कि पुलिस घायल या बीमार युवकों को जल्दी से इलाज के लिए अस्पताल पहुंचा रही है। लेकिन, पूरा वीडियो कुछ और ही हकीकत बया कर रहा है।

 

पुलिस ने तीनों युवकों को जयपुर रोड पर 20 अगस्त की रात 12:30 बजे पकड़ने का दावा किया है। जबकि इन सीसीटीवी फुटेज से पुलिस का झूठ भी उजागर हो चुका है। इसे ऐसे समझे कि पुलिस दावे से उलट उसी रात तीनों युवकों को रात 12:54 बजे एमजी अस्पताल लेकर आई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि तीनों युवकों को पकड़ थाने ले गई। तीनों से पूछताछ की। कपड़े उतरवाकर बैरक में बंधक बनाया। जहां तीनों युवक भिड़े और उन्हें लेकर पुलिस एमजी अस्पताल लाई। इतना सबकुछ महज 24 मिनट में ही हो गया। यह बात किसी भी तरह से गले नहीं उतरती।

 

यह है हकीकत : संवेदनहीनता, तोड़ा कानून

फुटेज देखिए, जिसमें एक युवक को दोे पुलिसकर्मी कंधा देकर तेज गति से दौड़ाकर ट्रोमा वार्ड में ले जा रहे है। पुलिस अगर इनके प्रति संवेदनशील होती तो पास ही 3 स्ट्रैचर पड़े थे। सुरक्षागार्ड और हेल्पर भी रात्रि ड्यूटी पर होते है। इससे पहले युवक को बाइक पर बैठाकर सीधे ट्रोमा वार्ड ले जाया गया। रात में वार्ड में सरपट बाइक आती देख नर्सिंगकर्मी भी स्तब्ध रह गए। मरीजों के परिजन बाइक की आवाज सुनकर बाहर निकल आए। सड़क हादसों के घायलों को भी स्ट्रेचर से वार्ड में ले जाया जाता है। फिर यहां तो पुलिस ने खुद ही इसे सामान्य मारपीट बताया है। फिर इस तरह बाइक पर युवक को ले जाने की जल्दबाजी किसलिए थी। अगर मान ले कि युवकों की हालत ज्यादा खराब थी तो फिर तीसरे युवक के दोनों हाथ-पैर पकड़ बेरहमी से ले जाने की बजाय पास ही पड़े स्ट्रैचर का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया।

 

निर्दोष को सजा क्यों, सबूत नहीं होने से एक को छोड़ा

इन दिनों यह भी प्रचार-प्रसार करवाया जा रहा है कि युवक शातिर चोर है और भागने की कोशिश कर रहे थे। कुछ लोग इसे चोरियों के खुलासे की सफलता से जोड़कर भ्रामक प्रचार भी कर रहे हैं कि भास्कर पुलिस और समाज विशेष के खिलाफ है, जबकि ऐसा नहीं है। यह सही है कि अपराधियों के लिए किसी तरह की हमदर्दी नहीं होनी चाहिए और सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन, कानन के दायरे में। महज संदेह के आधार पर इस तरह बर्बरता पूर्वक किसी को पीटना कहा तक जायज है। पछू ताछ के बाद अगर कोई निर्षेदा निकला तो उसे न्याय कैसे मिलेगा। जैसा कि, इस मामले में सरज के साथ हुआ। सबूत नहीं होने पर उसे रिहा किया गया। बेवजह उसे पुलिस की ज्यादतियां सहनी पड़ी। बिना परिजनों को बताए किसी को उठाकर ले जाने और फिर कई दिनों तक बंधक बनाकर पीटना सभ्य समाज को डराने वाला कदम है।

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