जिसने जन्म लिया है उसकी मौत होकर रहेगी. यही सृष्टि का नियम है. कोई प्राकृतिक तरीके से मरता है तो कोई समय से पहले ही किसी हादसे या किसी बीमारी का शिकार होकर मरता है. कई लोग व्यक्ति के मरने के बाद डेड बॉडी का पोस्टमॉर्टम करवाते हैं. परंतु पोस्टमॉर्टम अधिकतर उन्ही लोगों का किया जाता है जिनकी मौत संदिग्ध होती है. जिनकी मौत प्राकृतिक होती है उनका पोस्टमॉर्टम नहीं किया जाता.

पोस्टमॉर्टम रूम के अंदर के राज़ :

पोस्टमॉर्टम में डेड बॉडी के साथ चीड-फाड़ कर के मृत्यु के कारण को पता किया जाता है. इससे यह पता चल जाता है कि व्यक्ति की मौत कब और कैसे हुई. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है पोस्टमॉर्टम रूम के अंदर होता क्या है?

कैसे वहां पर मौजूद लोग इस भयानक मंजर का सामना करते हैं? इसी बात को ध्यान में रखते हुए हम आपको एक पोस्टमॉर्टम कर्मचारी की डायरी में लिखी कुछ खौफनाक बातें बताएंगे. आईये जानते हैं किस दौर से गुज़रते हैं वहां पर मौजूद लोग.

यह डायरी अहमदाबाद के एक पोस्टमॉर्टम हाउस में काम करने वाले कर्मचारी बाबूभाई सितापारा की है. बाबूभाई कई सालों से शरीर को चीड-फाड़ करते आ रहे हैं. रूम के अंदर होने वाले अनुभव को उन्होंने अपनी डायरी में उतारा है. उनके इस अनुभव को पढ़कर आप समझ जाएंगे कि जिस कमरे में लोग कुछ सेकंड भी नहीं बिता सकते वहां पर बाबूभाई सालों से काम कर रहे हैं.

वैसे तो बाबूभाई की डायरी में कई घटनाओं का ज़िक्र है. डायरी में लिखा है कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसी-ऐसी शरीरों का पोस्टमॉर्टम किया है जिसे कोई भी देखकर बेहोश हो जाएगा. उन्होंने अपनी डायरी में एक घटना का ज़िक्र करते हुए लिखा कि एक बार उन्हें एक ऐसी बॉडी का पोस्टमॉर्टम करना पड़ा था जिसकी मौत 8 दिन पहले हो चुकी थी. सिर कटी हुई उस लाश में कीड़े रेंग रहे थे. पोस्टमॉर्टम करने के बाद बाबूभाई ने कई दिनों तक खाना नहीं खाया था.

एक बार तो बाबूभाई को एक लक्ज़री और मिनी बस के टक्कर में हुई मौतों के लिए करीब 18 शवों का पोस्टमॉर्टम करना पड़ा था. जगह की कमी के कारण उन सभी बॉडी को पोस्टमॉर्टम यार्ड में ही रखा गया था. एक साथ इतने सारे लोगों की लाशें देखकर वह घबरा गए थे. अपनी डायरी में बाबूभाई ने यह भी लिखा है कि उन्हें सबसे ज़्यादा बुरा उस वक़्त लगता है जब उन्हें किसी छोटे बच्चे का पोस्टमॉर्टम करना पड़ता है. बाबूभाई के पिताजी और दादाजी भी इसी काम में थे.

आसान नहीं शवों को खोल कर देखना

अमूमन पर्दे पर कई लोगों ने फोरेंसिक पैथोलॉजिस्ट को काम करते हुए देखा है. लेकिन असल में इस काम में बेहद दुश्वारियां हैं.

लंदन के सेंट थॉमस अस्पताल में हिस्टोपैथोलॉजिस्ट के रूप में काम काम करने वाली डॉ सिमी जॉर्ज लगभग रोज ही मौत के कारणों का पता लगाने के लिए शव परीक्षण करती हैं.

डॉ सिमी जॉर्ज शवों के दिल, आंखें, पसलियों और खोपड़ी को खोलकर देखती हैं.

जॉर्ज बताती हैं कि कई बार तो मृत शरीर इतना गल चुका होता है कि उसका चेहरा नहीं दिखता, खोपड़ी काली पड़ जाती है और इधर-उधर कीड़े रेंग रहे होते हैं. ऐसे में मौत की वजह पता करने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ जाता है.

सड़े-गले शव

हिस्टोपैथोलॉजिस्ट वे होते हैं जो कुदरती मौत का मेडिकल कारण तलाशते हैं, जबकि फोरेंसिक पैथोलॉजिस्ट अस्वाभाविक मौत के कारणों का पता लगाते हैं.

जॉर्ज हर हफ्ते करीब 50 शव परीक्षण करती हैं. ये या तो मृत व्यक्ति के रिश्तेदारों की इजाज़त से किए जाते हैं, या अधिकारी के आदेश पर. इसके अलावा शव परीक्षण तब किया जाता है जब डॉक्टर मौत की वजह जानने में नाकाम रहता है.

दो बच्चों की मां जॉर्ज बताती हैं कि ये काम तो बेहद कठिन है लेकिन वे काम के दौरान कभी विचलित नहीं होतीं. वे बताती हैं, “मुझे सड़े-गले शवों में रेंग रहे कीड़ों, मल या मूत्र से कोई फर्क नही पड़ता. हां, पेट में बचे अवशेषों को देखकर बुरी तरह उल्टी आती है.”

मौत के बाद शवों को मुर्दाघर में लाया जाता है जहां उन्हें 4 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में रखा जाता है. ऑटोप्सी के लिए मेज पर उन्हें बिना कपड़ों के लिटाया जाता है और आंखें खुली हुई होती हैं

अगर मौत तुरंत हुई होती है तो मृत देह की चमड़ी फीकी पड़ जाती है और रंगत नीली हो उठती है.

मौत वर्जित विषय नहीं

सेंट थॉमस में ही सर्विस मैनेजर ट्रेसी बिग्गस जॉर्ज की साथी हैं. वे शवों को खोलने और अंगों को अलग करने का काम करती हैं.

बिग्गस कहती हैं, “ये काम करते हुए हमें हर दिन ये अहसास होता है कि जीवन कितना दुर्लभ है और मौत कितनी आसान है.”

 

वे बताती हैं, “मुझे मौत से डर लगता है. अपनोंं के खोने का डर होता है. रोलर कॉस्टर पर भी नहीं जाती कि कहीं मुझे हार्ट अटैक न आ जाए.”

उम्मीदों की खिड़की

डॉ जार्ज और बिग्गस जैसे लोगों का काम समाज में उम्मीदों और आशाओं की एक खिड़की खुलने जैसा है.

पैथोलॉजिस्ट कैंसर जैसी लंबी बीमारियों से मरने वाले लोगों के शवों का परीक्षण करते हैं. इससे उन्हें ये जानने में मदद मिलती है कि इलाज असर कर रहा है या नहीं.

यही नहीं, पोस्टमार्टम से कई आनुवंशिक रोगों का भी पता चलता है जिससे मृत व्यक्ति के परिवार के लोगों को इसके खतरे से बचाया जा सकता है.

डॉ जॉर्ज कहती हैं, “पोस्टमार्टम से परिवार वालों को मौत के कारणों के बारे में बताने के अलावा पेशेवरों को रोग और रोग के विकास के बारे में अधिक जानकारी पाने में मदद मिलती है. ये जानकारी बाकियों के काम आती है.”

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