महाकाल और कालभैरव के अलावा लोग 2500 वर्ष पुरानी विश्वप्रसिद्ध राजा भृर्तहरि की गुफा को देखने पहुंच रहे हैं।

गुफा नंबर एक में राजा भृर्तहरि व नंबर दो में उनके भांजे राजा गोपीचंद की तपस्थली है। काले पत्थरों, मिट्टी से बनी ये गुफाओं में अंदर जाने के मार्ग काफी संकरे हैं। लोग झुककर और बैठकर जाते हैं।

हवा की कमी है। कोई भी व्यक्ति ज्यादा देर गुफा नहीं रह सकता है। गर्मी में गुफा में दर्शन कठिन होते हैं। मान्यता है कि 2500 वर्ष पहले गुरु गोरखनाथ व बाद में राजा भृर्तहरि ने 12 वर्ष गुफा में तपस्या की। पुराने समय में गुफा से चारधाम जाने के रास्ते निकलते थे।

उज्जैन के प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य के भाई का नाम राजा भतृहरि था। किसी समय में राजा भर्तृहरि बहुत ज्ञानी राजा थे, लेकिन वे दो पत्नियां होने के बावजूद भी पिंगला नाम की अति सुंदर राजकुमारी पर मोहित गए। राजा ने पिंगला को तीसरी पत्नी बनाया। वे पिंगला के मोह में उसकी हर बात को मानते और उसके इशारों पर काम करने लगे। पिंगला इसका फायदा उठाकर व्यभिचारिणी हो गई।

वह घुड़साल के रखवाले से ही प्रेम करने लगी। उस पर मोहित राजा इस बात और पिंगला के बनावटी प्रेम को जान ही नहीं पाए। जब छोटे भाई विक्रमादित्य को यह बात मालूम हुई और उन्होंने बड़े भाई के सामने इसे जाहिर किया, तब भी राजा ने पिंगला की चालाकी भरी बातों पर भरोसा कर विक्रमादित्य के चरित्र को ही गलत मान राज्य से निकाल दिया।

बरसों बाद पिंगला की चरित्रहीनता तब उजागर हुई, जब एक तपस्वी ब्राह्मण ने घोर तपस्या से देवताओं से वरदान में मिला अमर फल (जिसे खाने वाला अमर हो जाता है) राजा को भेंट किया। राजा पिंगला पर इतने मोहित थे कि उन्होंने वह फल उसे दे दिया, ताकि वह फल खाकर हमेशा जवान और अमर रहे और राजा उसके साथ रह सकें।

राजा से मिला यह फल पिंगला ने घुड़साल के रखवाले को दे दिया। उस रखवाले ने उसे वेश्या को दे दिया, जिससे वह प्रेम करता था। वेश्या यह सोचकर कि इस अमर फल को खाने से जिंदगी भर वह पाप कर्म में डूबी रहेगी, राजा को यह कहकर भेंट करने लगी कि आपके अमर होने से प्रजा भी लंबे वक्त तक सुखी रहेगी।

पिंगला को दिए उस फल को वेश्या के पास देख राजा भर्तृहरि के होश उड़ गए। उनको भाई की बातें और पिंगला का विश्वासघात समझ में आ गया। राजा भर्तृहरि की आंखें खुलीं और पिंगला के लिए घृणा भी जागी। फिर भी पिंगला व उस रखवाले को सजा न देकर वे स्त्री और संसार को लेकर विरक्त हो गए। फौरन सारा राज-पाट छोड़ दिया। आत्मज्ञान की स्थिति में राजा भर्तृहरि ने भर्तृहरि शतक ग्रंथ में समाए श्रृंगार शतक के जरिए सौंदर्य खास तौर पर स्त्री सौंदर्य से जुड़ी वे बातें कहीं, जिनको कोई मनुष्य नकार नहीं सकता।

 

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